उगलती हूँ घृणा

सबकी जो सुनी ' लजीली कहा "
मन की जो सुनी 'हठीली ' कहा |

 

--मै मूलतः म. प्र . के एक छोटे शहर ग्वालियर से हूँ | वहां के माधवगंज मोहल्ले मे ही मेरा बचपन और युवावस्था व्यतीत हुई है |सारी शाम गिल्ली -डंडा , सितोलिया और लुका -छिपी खेलते हुए वंहा बचपन बीता है |मुझे अब भी याद है , खेल के बीच मे ही मां की आवाज सुनाई देती ,

" घर मे चाय ख़तम हो गयी है "
" अदरक का टुकड़ा ला देना "
'' दौड़ जा और धनिया ले आ रुपये ,दो रुपये की "

और मै दौड़ कर परचून की दूकान तक जाती और छोटे -मोटे जरूरत की चीजे लाकर म़ा को पकड़ा देती और फिर खेल की टोली मे शामिल हो जाती |


फिर एक दिन अचानक मुझे उस परचून की दुकान पर जाने से रोक दिया गया |
अचानक मुझे क्यों मना किया इसका कारण जानने पर पता चला की
"मै बड़ी हो गयी हूँ | "

अब मै बड़ी हो रही थी और इसके साथ -साथ मुझ पर रोक -टोक भी बढ़ रही थी |


'सहेली के घर क्यों जा रही हो ?"
' 'सड़क पर तुम जिससे बात कर रही थी , वो कौन था ?"
'अपनी सहेली के साथ उस दिन तुम सड़क पर जोर -जोर से क्यों हँस रही थी ?"
फिर तो जैसे रोक -टोक का न रुकने वाला सिलसिला शुरू हो गया |

"बाहर आने जाने की मनाही |"
"फिर , खिड़की से देखने की मनाही |"
"फिर , छत पर खड़े होने की मनाही |"
"फिर स्कर्ट पहनने की मनाही '"

no , no और सिर्फ no

तू खुद को बदल ,खुद को बदल
तब ही तो जमाना बदलेगा |.



१)एक बार स्कूल से आते समय एक हमउम्र लडके ने मेरे हाथ मे एक कागज का टूकडा थमा दिया था | जब मैंने उसे खोलकर पढ़ा तो उसमे लिखा था की मै उसे बहुत अच्छी लगती हूँ और मुझे देखने के लिए वो सुबह शाम मेरे स्कूल के रस्ते पर मेरी राह ताकता है |
जब किताबो के बीच घरवालो के हाथ यह प्रेम- पत्र लगा तो उन्होंने मेरी जमकर पिटाई की थी | आज भी मेरी सवालिया नज़ारे सबसे पूछ रही है " "आखिर मेरी खता क्या थी ?"

२)एक बार गलती मेरा भाई उसके सिगरेट का पेकेट कमरे मे भूल गया था और मुझसे नहीं रोका गया और मैंने सिगरेट का एक कश लगा लिया था | फिर मार मुझे ही पड़ी थी , मेरे भाई से किसी ने नहीं पूछा की कमरे मे सिगरेट कहाँ से आयी ?
३)एक बार मेरे भाई से मेरी जोर -जोर से बहस हो रही थी | हम दोनों के आवाज अपनी चरम सीमा पर थे | थोड़ी देर के बाद मां ने आकार मुझे चुप रहने को कहा | लड़कियों को इतनी जोर से बात नहीं करनी चाहिये | आज तक मै अपने भाइयो के साथ किसी बात पर बहस नहीं कर पायी |

४) मुझे आज भी ताश खेलना बहुत अच्छी तरह से आता है |लेकिन जब कभी मेरे भाई ताश खेलते मुझे पास फटकने नहीं दिया जाता | मै शर्त लगा सकती हूँ की यदि मै यदि अपने भाई के साथ अब भी जुआं खेलने बैठू तो उन्हें आसानी से हरा सकती हूँ |
४) मेरे घर पर एक बार मेरे दो पुरुष मित्र आये | मेरे मां पिताजी ने उनके अभिवादन का जवाब नहीं दिया | भाई ने उनके स्कूटर के पेट्रोल मे चुपके से शक्कर मिला दी | मुझे लगा मै एक कप चाय से उनका स्वागत करूँ , पर मै एसा कर नहीं पायी | दूसरे ही दिन मेरे भाई की एक महिला मित्र आयी थी पिताजी ने उससे नाम पूछा था और मां ने उसे हलुआ बना कर खिलाया था |

कितनी बाते बताऊँ , शायद पूरी जिंदगी निकल जायेगी बताने के लिये |
सिर्फ इतना ही कहना चाहती हूँ की अब अपने जीवन मे मै कोई बंधन , मनाही नहीं चाहती | जब तक ये बंधंवादी की मनाही का सिलसिला चालू रहेगा ,तब तक इन बंधंवादियो की तरफ मै उगलती रहूंगी ,


घृणा !

घृणा !!

और सिर्फ घृणा !!!







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